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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 181, Verse 20

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 181, verse 20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 181 · श्लोक 20

संस्कृत श्लोक

हा कष्टं किमिदं जातमिति तस्मिन्वदत्यथ । आवाभ्यां सुचिरं भ्रान्त्वा दृष्ट एकत्र वृक्षकः ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

तब उस पुरुष ने कहा : हे तापस, इस मेरे कुल, देश, तपस्या आदि को जानने से तुम्हारा क्या प्रयोजन है, क्योकि शरीरियों की अत्यन्त विचित्र इच्छाएँ किसी प्रयोजन से ही होती हैं निष्प्रयोजन व्यर्थ की जिज्ञासा नहीं होती