Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 181, Verses 17–19
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 181, verses 17–19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 181 · श्लोक 17-19
संस्कृत श्लोक
तेनेत्युक्ते च तावावां प्राप्तो मुन्याश्रमं च तम् ।
यावत्तत्र महारण्ये पश्यावश्चान्तरूपिणम् ॥ १७ ॥
न वृक्षं नोटजं किंचिन्न गुल्मं न च मानवम् ।
न मुनिं नार्भकं नान्यन्न वेदिं न च वा द्विजम् ॥ १८ ॥
केवलं शून्यमेवाति तदरण्यमनन्तकम् ।
तापोपतप्तमभितो भूमौ स्थितमिवाम्बरम् ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
उसी विचार को स्पष्ट करते हैं।
तो यह ब्राह्मण अभी तक जीवित तो है, क्योकि बराबर आहताकृति होकर, श्वास लेता है और
तत्तत्समयजन्य शीत, वात, धूप आदि स्पर्शो को जानता है। इसके अनन्तर उस पुरुष को मैंने बहुत
दिनों तक दिवस की धूप सहकर नाना प्रकार की उपचर्या से धीरे-धीरे अपने प्रति विश्वस्त कर लिया।
फिर पूछा कि 'हे भगवन्, आप कौन हैं और हे विशालाक्ष, जिसमें जीवन चिरकाल के दीर्घ उच्छवासों
से लक्ष्य और अलक्ष्य हो रहा है ऐसा दारुण तप क्यों कर रहे हैं