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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 181, Verses 21–22

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 181, verses 21–22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 181 · श्लोक 21,22

संस्कृत श्लोक

स्निग्धच्छविर्घनच्छायः शीतलोऽम्बुधरोपमः । तले तस्य समाधाने संस्थितो वृद्धतापसः ॥ २१ ॥ आवामग्रे मुनेस्तस्य च्छायायां शाद्वलस्थले । उपविष्टौ चिरं यावन्नासौ ध्यानान्निवर्तसे ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

इतना कहने पर मैंने प्रयत्न से तथा विनयपूर्ण आग्रह से जब पूछा तब उस तपस्वी ने मुझे यह उत्तर दिया : मैं मथुरा में उत्पन्न हुआ और पिता के घर में ही वृद्धि को प्राप्त हुआ, बाल्यावस्था और यौवन के मध्य में (अर्थात्‌ कुमार अवस्था में) ही पद (शब्दशास्त्र) और पदार्थ (अर्थशास्त्र) का ज्ञाता बन गया