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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 181, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 181, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 181 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

कुन्ददन्त उवाच । आवासमन्तरे गन्तुं प्रवृत्तौ मुदिताकृती । मथुरानगरीं चन्द्रसूर्याविन्द्रपुरीमिव ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

स्वयं प्रबुद्ध राम चिरकाल तक तत्वजिज्ञासा से अपने आश्रय में स्थित कुन्ददन्त नामक द्विज को प्रस्तुत उपदेश के श्रवण से तत्वबोध हआ या नहीं इस अपने सन्देह को गुरुमुख से परिमार्जित करने की इच्छा से आश्चर्यभ्ूत उसकी कथा की भूमिका रचते हुए गुरु से प्रार्थना करते है । हे भगवन्‌, जिस प्रकार संसार की समग्र वस्तुओं के रूप की सम्यक्‌ अनुभूति के लिये सूर्य अन्धकार का नाश करता है उसी प्रकार आप मेरे इस संशय का नाश कीजिए

सर्ग सन्दर्भ

एक सौ उन्नासीरव सर्ग समाप्त एक सौ अस्सीवाँ सर्म श्रीरामचन्द्रजी द्वारा वर्णित कुन्ददन्तोपाख्यान में पर्वत पर वृक्ष मेँ लटके हुए तपस्वी के वरप्राप्तिपर्यन्त वृत्तान्त का वर्णन |