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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 181, Verses 2–6

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 181, verses 2–6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 181 · श्लोक 2-6

संस्कृत श्लोक

प्राप्य रोधाभिधं ग्रामं विश्रम्याम्रवणाचले । उषितौ द्वे दिने तस्मिन्सालीसे नगरे सुखम् ॥ २ ॥ भृङ्गाङ्गनाजनमनोहरहारिगीतलीलाविलोलकलकण्ठविहंगमङ्ग । पुष्पाम्बुवाहशतचन्द्रनभोवितानं राजीवरेणुकणकीर्णदिगन्तरालम् ॥ ३ ॥ नदीतीरलतोन्मुक्तपुष्पप्रकरपाण्डुराः । तरत्तरङ्गझांकारगायनानन्दिताध्वगाः ॥ ४ ॥ जङ्गलाद्रिपुरग्रामश्वभ्रानूपस्थलावनीः । समुल्लङ्घ्य दिने तस्मिन्सरित्स्रोतः सरांसि च ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

सन्देह का बीज दर्शीने के लिए आख्यान प्रारम्भ करते हैँ । किसी एक समय जब कि मैं विद्यामन्दिर में विद्वानों की सभा में स्थित था उस समय कोई द्विजश्रेष्ठ ने प्रवेश करके शीघ्र ही चारों ओर देदीप्यमान द्युतिवाली द्विजसभा को प्रणाम किया ओर आसन ग्रहण किया हमने भी खड़े होकर उसका अभिवादन किया । तब प्रकरणप्राप्त अपने अधीयमान वेदान्त, सांख्य आदि के सिद्धान्तं के वादों को बन्द करके सुखपूर्वक विश्राम करने के अनन्तर बैठे हुए उस श्रेष्ठ ब्राह्मण से मैंने पूछा : हे विद्वानों में श्रेष्ठ, दीर्घमार्ग मे चलने से थके हुए आप किसी अर्थ को प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील मालूम पडते हैँ । कहिये कहाँ से आपका आगमन हुआ