Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 17
सोलहवाँ सर्ग समाप्त सत्रहवाँ सर्ग अनहंभावरूप अग्नि से अहंभावरूप बीज के दग्ध हो जाने पर देहादिसंसार का पूर्णरूप से बाध हो जाने के बाद यह संसार बिलकुल मिथ्या भासने लगता है, यह वर्णन।
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- Verse 1सम्पूर्ण स्रंग्रति का मूल काम ही हैं, इसलिए अनहंभाव द्वारा सवस पहले उक्ती की निवृत्ति कहत…
- Verse 2काम का उपरम हो जाने पर लोभ आदि दोषों के क्षय से वैराग्य आदि सम्पत्ति द्वारा सम्पूर्ण मानि…
- Verse 3साधन सम्यन्न पुरुष को श्रवण आदि के द्वारा ज्ञानोदय होने पर व्रह्म से अतिरिक्त अहमर्थ का,…
- Verse 4अन्तिम स्राक्षात्काखृत्ति में आरढ़ हुआ ब्रह्म ही अज्ञान, अहंकार आदि के निस में समर्थ हैं,…
- Verse 5अज्ञान ओर अहंकार की नाई व्यष्टिसमष्टिरूप स्थूल देह का भी निवर्तक व्रह्म ही है, इस आशय से…
- Verse 6अथवा अनहंभावनावृत्ति में प्रतिफालित चिति से ही अहन्ता का नाश होता है, यही पक्ष रहे, इस आश…
- Verse 7अनहंभावात्मक चितिरूपी अग्नि की ज्वाला से ब्रह्मविद्या के अधिकारी उत्कृष्ट ब्राह्मण आदि वर…
- Verse 8अथवा बाधित अहन्तादि की शून्यता नहीं है, किन्तु ब्रह्मता ही है, इस आशय से कहते हैं । शरीरर…
- Verses 9–11शाखासमूह का विस्तार कर देती है
- Verse 12इस तरह अहंभावरपी वटबीज के भीतर शरीररूपी महान् वृक्ष भी स्थित है, यह समझना चाहिए, यह कहते…
- Verse 13वटाविबीज के द्रष्टान्त से ही एवोक्त अर्थ का अनुभव कराते हैं / हे श्रीरामचन्द्रजी, यह प्रस…
- Verse 14इस तरह अविचार के फल सर्वत्र अनिर्मोक्ष को बतनाकर अब विचार के फल मोक्ष को बतनाते हैं। श्रव…