Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 17, Verse 5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 17, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 17 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
अहंतापुटकोड्डीनो ब्रह्मवीरबलेरितः ।
शरीरयन्त्रपाषाणो न जाने क्वाशु गच्छति ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
अज्ञान ओर अहंकार की नाई व्यष्टिसमष्टिरूप स्थूल देह का भी निवर्तक व्रह्म ही है, इस
आशय से कहते हैं ।
अहन्तारूप प्रमातारूपी यन्त्रपुटक से आविर्भूत हुए ब्रह्मसाक्षात्काररूपी वीर के बल से फेंका
गया शरीरयन्त्ररूपी पाषाण उड़कर न जाने कहाँ शीघ्र चला जाता है