Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 17, Verse 13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 17, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 17 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
शाखाशतेद्धदलपुष्पफलद्रुमोऽस्ति बीजोदरे ननु दृशा परिदृश्यतेऽसौ ।
देहोऽस्त्यहंत्वकणिकान्तरशेषदृश्यसंवित्परीत इति बुद्धिदृशैव दृष्टम् ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
वटाविबीज के द्रष्टान्त से ही एवोक्त अर्थ का अनुभव कराते हैं /
हे श्रीरामचन्द्रजी, यह प्रसिद्ध है कि जैसे बीज के भीतर सैकड़ों शाखाओं से विराजमान दलों,
पुष्पों ओर फलों से समन्वित वृक्ष हैं, क्योंकि उसके रहने से ही तो अंकुरादि के रूप में निकलते हुए
उसे सब लोग अपनी आँखों से देखते हैं वैसे ही अहंकाररूपी सूक्ष्म बीज के भीतर समस्त दृश्यों से
युक्त यह देह है, इसे सूक्ष्मबुद्धिरूपी अपनी आँखों से विद्वान् पुरुषों ने ही देखा है