Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 17, Verse 8
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 17, verse 8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 17 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
शरीरपर्णान्निष्पीतस्त्वहंभावरसासवः ।
अनहंतार्कमार्गेण परतामधिगच्छति ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
अथवा बाधित अहन्तादि की शून्यता नहीं है, किन्तु ब्रह्मता ही है, इस आशय से कहते हैं ।
शरीररूपी पत्ते से भलीभाँति पिया गया अहंभावरूपी रसासव अनहन्तारूपी सूर्य की किरण
द्वारा अपने कारणभूत सूक्ष्मरूपता को प्राप्त हो जाता है