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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 168, Verse 3

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 168, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 168 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

तासां स्वसंविदामेव ततः स कुरुते स्वयम् । मनो बुद्धिरहंकार इत्याद्या विविधाभिधाः ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

ये आत्मख्याति आदि भ्रान्तिदृष्टियाँ चिन्मात्र से उदित होती हैं ओर चिन्मात्र परमार्थरूप से अत्यन्त शुद्ध (कल्पनाशून्य) आकाश है। अतः मैं सारी कल्पनाओं को तन्मयी ही देखता हूँ, क्योकि (तद्यदिदमयोऽदोमयः सर्वमयः“ (जो यह इदंमय, अदोमय, सर्वमय है वह सब ब्रह्म ही है) ऐसी श्रुति है