Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 168, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 168, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 168 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
यथा करोत्यबुद्ध्यादिरावर्तादि पयोनिधिः ।
तथा करोति खे स्वात्मा सर्वेशः सर्ववेदनाः ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि जगत्ख्याति होती तो वह आत्मख्याति है या असत्ख्याति है या अख्याति है इत्यादि विकल्पों
का अवसर होता, जब जगत्ख्याति ही नहीं है तब किसकी चतुर्विधता होगी ? इस आशय से कहते हैं :
हे रामजी, इन ख्यातियों का कदापि संभव नहीं है । निश्चेष्ट (ख्याति आदि कल्पनाओं के मूलभूत
चित्त की चेष्टाओं से रहित) शान्त अव्यपदेश्य ज्ञाता (दरष्टा) ही केवल हे