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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 16

पन्द्रहवाँ सर्ग समाप्त सोलहवाँ सर्ग इस उपदेश को सुनकर विद्याधर की समाधि मं लीनता तथा अनहंभाव की प्रशंसा द्वारा कथा की समाप्ति का वर्णन ।

14 verse-groups

  1. Verse 1भुशुण्डजी ने कहा : हे मुने, मैं यों कह ही रहा था कि उस विद्याधर नायक का समस्त दृश्यज्ञान…
  2. Verse 2तदनन्तर बार-बार मने उसे इधर-उधर से जगाया, लेकिन परम निर्वाणपद को प्राप्त वह फिर शब्दादि व…
  3. Verse 3हे महर्षे, मुख्य अधिकारी होने के कारण मेरे सिर्फ उतने उपदेश से ही प्रबोधवान्‌ होकर वह परम…
  4. Verse 4अब महाराज करिष्ठजी अपने एवोक्त अर्थ में विद्याधर के चित्त का उदाहरण देकर वर्णन में शीघ्रत…
  5. Verse 5वह कौन-सा उपदेश है 2 यह पूछने पर उको कहते हैं / हे श्रीरामजी, आपके चिदेकरस प्रत्यगात्मा म…
  6. Verse 6यही अभव्य पुरुष के चित्त में पड़कर ऐसे नहीं ठहर पाती, जैसे कि उलटे चिकने साफ दर्पण में नि…
  7. Verse 7परन्तु भव्य शान्तपुरुष के मन में जाकर शीघ्र लग जाती है और खूब चिपक जाती है तथा उसके अन्तः…
  8. Verse 8इस संसार के दुःखरूपी सेमर के वृक्ष का महान्‌ बीज अहंभावना ही है तथा उस अहंभावना के समान ह…
  9. Verse 9उसीको बतला रहे हैं बीजावस्था के स्थान में तो अहंभाव, इसके कार्यभूत वृक्ष के स्थान में ममभ…
  10. Verse 10अनुसरण करते हुए महाराज वस्निष्ठजी विद्याधर की कथा का उपर्स्नहार करते हैं / हे मुनिश्रेष्ठ…
  11. Verse 11परन्तु शुद्ध अन्तःकरणवाले पुरुष के ज्ञान में चिरकालिक अभ्यास ही कारण हैं, यह नियम तो है ह…
  12. Verse 12महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, मेरु पर्वत के शिखर पर इस तरह मुझसे कहकर विहं…
  13. Verse 13हे श्रीराम, तदनन्तर उस सिद्ध भुशुण्डीजी से पूछकर उनकी आज्ञा से मैं उस विद्याधर के पास उक्…
  14. Verse 14हे श्रीरामचन्द्रजी, आज मैंने आपसे काकभुशुण्डीजी के द्वारा कही गई कथा से प्रतिपादित विद्या…