Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 16, Verse 7
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 16, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 16 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
भव्ये तु शान्तमनसि लगत्यभ्येत्यविच्युतिम् ।
प्रविश्यान्तर्विचाराख्यामर्चिरर्कमणौ यथा ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
परन्तु भव्य शान्तपुरुष के मन में जाकर शीघ्र लग जाती है और खूब चिपक जाती
है तथा उसके अन्तःकरण में प्रविष्ट होकर यह सम्पूर्ण मोहरूपी जंगल को जलाने में समर्थ
विचारनामक अग्निशिखा ऐसे पैदा करती है, जैसे कि सूर्यकान्त मणि के भीतर प्रविष्ट होकर
सूर्य की किरण अग्निशिखा पैदा करती है