Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 16, Verse 3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 16, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 16 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
स प्राप परम स्थानं तावन्मात्रप्रबोधवान् ।
केनचिन्नाधिकेनाङ्ग यत्नेनातिशयैषिणा ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
हे महर्षे, मुख्य अधिकारी होने के कारण मेरे
सिर्फ उतने उपदेश से ही प्रबोधवान् होकर वह परमपदरूप स्थान को प्राप्त हो गया | श्रवण, मनन,
निदिध्यासन आदि किसी ओर अधिक अतिशयशाली यत्न से नहीं