Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 158, Verse 17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 158, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 158 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
तदेतच्छवमास्वाद्य शुष्का पूर्णा महोदरी ।
संपन्ना चण्डिका देवी रक्ता रक्तान्त्रपूरिता ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
मुक्ति की शीघ्रता और विलम्बे प्रयोजक चित्तके गुण और दोषों के कारण ही जीवो के जातिभेदों
की कल्पना हुई, यह दिखलाते हुए उनमें पाँच जातियों को विभाग कर दिखलाते है ।
यदि कल्प के आदि में सर्वप्रथमतः ही ब्रह्म जीवता को प्राप्त हो तो उसी जन्म में स्वाभाविक
ज्ञान ओर एश्वर्य से युक्त बुद्धि से विषयभोग करनेवाला जीव उसी जन्म में मुक्तिलाभ करता हे ।
उसकी जाति सात्त्विकसात्त्िकी होती है, जैसे कि सनक, सनन्दन आदि की