Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 158, Verse 16
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 158, verse 16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 158 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
यस्मिञ्छवं संपतितं जगत्यवनिमण्डले ।
तदिदं जगदाभातमस्माकं स्वप्नपूर्यथा ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
केवल यही एक संज्ञा नहीं हुई, किन्तु ब्रह्म का जीवभाव होनेपर मित्र उपाधियों के गुणों के अनुसार
राजस, सात्विक आदि तेरह संज्ञाएँ की हैं, ऐसा कहते हैँ ।
हे प्रभो, निर्विकार ब्रह्म के विकारी से होकर जीवभाव को प्राप्त होनेपर विविध नाम की जातियों
की कल्पनाएँ की गई