Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 158, Verses 12–15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 158, verses 12–15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 158 · श्लोक 12-15
संस्कृत श्लोक
चित्तं प्राणान्वितं व्योम्नि ययौ तत्रैव सिन्धुताम् ।
विदूरथारिरूपां तामखिलावनिपालिनीम् ॥ १२ ॥
देहो मेरुशताकारमहाशव इवाभवत् ।
द्वितीयोर्वीनिभो व्योम्नः पपाताशनिवज्रवत् ॥ १३ ॥
पिधानमिव कस्योर्वीवीथी कस्मिंश्चिदम्बरे ।
केशोण्ड्रकवदाभाते कस्मिंश्चिज्जागते भ्रमे ॥ १४ ॥
आकारपूरिताशेषवसुधाचलमण्डलः ।
विपश्चिच्छ्रेष्ठ कथितमेतत्ते तन्महाशवम् ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
अपरिच्छिन्न आत्मा की हिरण्यगर्भरूप से माया द्वारा परिच्छिन्नता करने पर हिरण्यगर्भ ही सब
संज्ञाएँ करता है, ऐसा कहते है।
मन्त्री कहेगा : जैसे यहाँ सावयव जन्तु के हस्त आदि अवयव हैं, वैसे ही अवयवविहीन आत्मा
की आतिवाहिकता हे । फिर आत्मा में यानी स्वव्यष्टि जीवों मेँ वह समष्टिरूप आत्मा ही नाना संज्ञाएँ
करेगा ओर आतिवाहिक समष्टिभूत स्वदेह के पंचीकरण द्वारा आधिभौतिक नाम धारण करनेपर
उनके अवयवो मे पृथिवी आदि संज्ञाएँ करेगा वही आत्मरूपी संकल्प से स्वप्नतुल्य यह जगत्भान
होनेपर नामरूप की कल्पना कर आत्मरूप व्यष्टिभाव से स्वयं ही व्यवहार करेगा । व्यवहार में
व्यष्टिभावकल्पना होनेपर तुम्हें लक्ष्य कर सृष्टिसंकल्परूप से (व्यष्टिभाव से) जो हिरण्यगर्भ यह
महात्मा है” यों स्फुरित हुआ इसी कारण तुम्हारी आतिवाहिकाकार जाति तामस-तामसी नामसे
प्रसिद्ध की गई