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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 154

12 verse-groups

  1. Verses 1–6आत्म-ज्ञान का उपदेश देंगे। उसे ग्रहणकर वह योग्य हो जायेगा। इस प्रकार से आप उसके गुरु होंग…
  2. Verses 7–14इस प्रकार कहनेपर विस्मय से व्याकुल हुई बुद्धि से इस दृश्यजगत का विचार कर मैं और भी आश्चर्…
  3. Verse 15चित्रूपी चन्द्रिका चारों ओर जिस अवभास (प्रकाश) का विस्तार करती है वह यह जगत्रूप चित्र, जो…
  4. Verse 16यदि कोई कहे कि पर्वत आदि स्थूल होने से प्रतिघात के योग्य हैं, वे अप्रतिघातस्वभाव कैसे होग…
  5. Verse 17यदि यह चिन्मात्र-कचन (स्फुरण) ही है तो इस पदार्थराशि का कोई कारण नहीं है, क्योकि इसके शरी…
  6. Verse 18तब यह भ्रान्ति ही हो, ऐसी आशंका कर भ्रान्तिपक्ष में भी निमित्त, द्रष्टा आदि का निरूपण संभ…
  7. Verse 19संविन्मात्ररूप मैं जिसके शरीर में प्रविष्ट होकर दुश्यवर्ती ओज में रहा वह प्राणी मेरे शरीर…
  8. Verses 20–21इसलिए उसका शरीर, मेरा शरीर आदि का अस्तित्व न होने के कारण यह सब आदि अन्त शून्य चित्‌ की आ…
  9. Verse 22“यह चिन्मात्र का स्फुरण है“ यह बुद्धि भी राहुका सिर इस कथन के समान केवल विकल्पमात्र ही है…
  10. Verse 23यह जगत्‌ समुद्र के फेन की तरह चिद्रूप सागर का फेन है । इसका नवीन स्फुरण क्या होगा ? यह अन…
  11. Verse 24शुद्ध चिन्मात्र-स्फुरण वृद्धि को प्राप्त चिद्घन ब्रह्म ही इस जगत्‌ के समान अवभासित होता ह…
  12. Verse 25कालतः आदि अन्त से शून्य, असीम, देशतः आदि-मध्यहीन वस्तुतः एक अद्वितीय अतएव कारणरहित, कार्य…