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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 154, Verse 22

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 154, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 154 · श्लोक 22

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

“यह चिन्मात्र का स्फुरण है“ यह बुद्धि भी राहुका सिर इस कथन के समान केवल विकल्पमात्र ही है, क्योकि षष्ठीतत्पुरुष समास के प्रयोजक भेद और सम्बन्ध की प्रसिद्धि नहीं है, इस अभिप्राय से कहते हैं । यह चिन्मात्र का स्फुरण भी नहीं है, केवल चिन्मात्र आकाश है । उसका स्फुरण क्या ओर कैसा ? क्या आकाश का भी स्फुरण होता है, भला उसका स्फुरण केसे होगा ?