Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 154, Verse 18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 154, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 154 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
अभ्यासाद्बोधविश्रान्तौ गुरुशास्त्रैकसेवनात् ।
द्वैताद्वैतदृशोः शान्त्या निर्वाणं चित्तमुच्यते ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
तब यह भ्रान्ति ही हो, ऐसी आशंका कर भ्रान्तिपक्ष में भी निमित्त, द्रष्टा आदि का निरूपण संभव
नहीं है, ऐसा कहते है ।
यदि इसको केवल भ्रान्ति ही मानो, तो भ्रान्ति का क्या कारण है, उस भ्रान्ति का कोन द्रष्टा
है, कोन मनन करनेवाला हे, वह कैसा है ओर कहाँ हे ?