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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 148

12 verse-groups

  1. Verses 1–14यह जगत्‌ दृश्य सागर से लहर, मणि, मोती आदि की तरह बाहर निकला, जैसे छेनी आदि ओजारों से तराश…
  2. Verses 15–17चाँदी की शिला के सदुश नदी, पर्वत, वन आदि में प्रतिबिम्बित आकाश, तारा ओर बादलों से वह ठसाठ…
  3. Verses 18–19जैसे महासागर में लहर तट में स्थित नष्ट-भ्रष्ट हो रहे अपने प्राक्तन अंग को लाती है वैसे ही…
  4. Verse 20प्रसंगतः मलिन और स्वच्छ चित्‌ के स्वभाव का उल्लेख करते है। जैसे लौकिक दर्पण जो जो वस्तु आ…
  5. Verse 21लेकिन स्वच्छ चित्‌ का ऐसा स्वभाव नहीं है, ऐसा कहते है । किन्तु जिस चित्रूपी दर्पण को यह स…
  6. Verse 22जिसकी बोधशालिनी अतएव निर्मल स्मृति नष्ट नहीं होती, उसे यह द्ैतरूपी पिशाच तनिक भी दुःखी नह…
  7. Verse 23जिन सत्पुरुषो को अभ्यास से साधु-सन्त ओर सत्शास्त्रों के संग से बोध हो जाता है, वह बोध जो…
  8. Verse 24आप तो तत्त्वज्ञ थे फिर आपको उस समय कैसे व्यामोह हुआ ? इस पर कहते है । उस समय मेरा वह बोध…
  9. Verse 25हे व्याध, तुम्हारी बुद्धि भी सत्संग रहित होने से अव भी शान्ति को नहीं प्राप्त होती है किन…
  10. Verses 26–27मुनि महाराज के कथन का अनुमोदन करता हुआ व्याध बोला। व्याध ने कहा : हे मुनिवर, आपका कथन सोल…
  11. Verse 28अभ्यास से अत्यन्त बद्धमूल हुई इस अविद्या का पार पाना अत्यन्त कठिन हे । यद्यपि यह अविद्यमा…
  12. Verses 29–34तुम्हारी बुद्धि सत्संगतिशून्य है, ऐसा जो मुनिमहाराज ने कहा था, उसका भी अनुमोदन करता हुआ क…