Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 148, Verses 26–27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 148, verses 26–27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 148 · श्लोक 26,27
संस्कृत श्लोक
यत्स्वेनैवात्मना भाति मणिमन्त्रौषधात्मना ।
यन्नाम नियतं तत्तु जाग्रत्यपि हि दृश्यते ॥ २६ ॥
जाग्रत्स्वप्नश्च चिद्भानमात्रमेवान्यतात्र का ।
जाग्रति स्वप्ननगरे वेदनात्सदृशात्मकम् ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
मुनि महाराज के कथन का अनुमोदन करता हुआ व्याध बोला।
व्याध ने कहा : हे मुनिवर, आपका कथन सोलह आने सत्य है इस प्रकार के पवित्रतम आपके
बोधउपदेशों से भी मेरा मन परमलक्ष्य सत्पदपर नहीं टिक रहा हे । ऐसा है या नहीं हे, इस तरह का
संशय-जाल इस स्वानुभूत वस्तु के विषय में भी शान्त नहीं होता है