Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 148, Verses 15–17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 148, verses 15–17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 148 · श्लोक 15-17
संस्कृत श्लोक
संविद्भ्रान्तिरियं भाति जगन्नाम्नी स्वरूपिणी ।
स्वयं च भ्रान्तिरस्मीतिवादिनी कात्र निश्चिता ॥ १५ ॥
चितिरेव चिरायेदं चित्तं चिमचिमायते ।
यदात्मन्येव सलिलं द्रववत्तदिदं जगत् ॥ १६ ॥
यथा स्वप्नं समालोक्य सुषुप्तमनुभूयते ।
तथा जाग्रत्समालोक्य निद्रा समनुभूयते ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
चाँदी की शिला के सदुश नदी, पर्वत, वन आदि में प्रतिबिम्बित आकाश,
तारा ओर बादलों से वह ठसाठस भरा, गर्ज रहे सागर की ध्वनि से युक्त था और वायु की सरसराहट
से पूर्ण था । वह दृश्यमण्डल मेने देखा, तदनन्तर वही गाँव, जो कि मैंने पहले स्वप्न प्रवेश के समय
देखा था, उसमें वह घर मुझे दिखाई दिया । उन्हीं सब बन्धुवान्धवों को, उन्हीं पुत्रों को, उसी पत्नी
को ओर उसी घर को, जिनकी अवस्था, उग्र, रूपरेखा, बनावट आदि जैसी पहले देखी थी हूबहू
वैसी ही थी, मेने देखा