Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 127, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 127, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 127 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
भगवन्कथयैतन्मे कथं भूगोलकं स्थितम् ।
कथमृक्षगणो याति लोकालोकः कथं गिरिः ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे मुनिनायक, इसके वाद पूर्वोक्त पूर्व आदि दिगन्त में सात द्वीप, सागर,
वन ओर पर्वतो मे गये हुए वे विपश्चित् क्या करते रहे ?
सर्ग सन्दर्भ
एक सौ पचीसवाँ सर्ग समाप्त एक सौ छब्बीसवाँ सर्ग मरे हुए सब विपश्चितो का अपने अन्दर संसारभ्रम का वर्णन ।