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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 127, Verses 2–4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 127, verses 2–4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 127 · श्लोक 2-4

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । यथा संकल्परचिता शिशोर्व्योमनि तिष्ठति । वीटा चिन्मात्रबालेन कल्पितो भूस्तथाम्बरे ॥ २ ॥ यथा तिमिरिकाक्षाणां केशचन्द्रादिदर्शनम् । चिदाकाशस्य सर्गादौ तथा पृथ्व्यादिदर्शनम् ॥ ३ ॥ यथा संकल्पनगरं धार्यमाणं न दृश्यते । धार्यते धार्यते मा च तथोर्व्यनुभवश्चितेः ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, ताड ओर तमाल के वृक्षो की पंक्तियों से पूर्ण द्वीप, पर्वत और वनों में विचरनेवाले उन विपश्चितो का वहाँ क्या हाल हुआ, उसे आप सुनिये । उन विपश्चितां से एक विपश्चित्‌ क्रौंच द्वीप में प्रसिद्ध वर्षं (सप्तद्वीप) के सीमारूप पर्वत के पश्चिम किनारे पर हाथी द्वारा पर्वततटवर्ती वप्रशिलापर गण्डस्थल तथा दाँतों से चूर-चूर किये जाने से मर गया (&) दूसरे विपश्चित को राक्षस ने युद्ध में क्षतविक्षत देह कर आकाश मार्ग से ले जाकर समुद्रवर्ती बड़वाग्नि में झोंक दिया वहाँ उसमें भस्म हो गया