Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 127
एक सौ पचीसवाँ सर्ग समाप्त एक सौ छब्बीसवाँ सर्ग मरे हुए सब विपश्चितो का अपने अन्दर संसारभ्रम का वर्णन ।
18 verse-groups
- Verse 1श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे मुनिनायक, इसके वाद पूर्वोक्त पूर्व आदि दिगन्त में सात द्वीप,…
- Verses 2–4श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स, ताड ओर तमाल के वृक्षो की पंक्तियों से पूर्ण द्वीप, पर्वत और व…
- Verse 5तीसरे विपश्चित को कोई विद्याधर इन्द्र सभा में ले गया, वहाँ प्रणाम न करने से क्रुद्ध हुए द…
- Verses 6–8चौथे विपश्चित् के, जो कुशद्रीप पर्वतवर्ती नदी के दलदल में सतर्कता से चल रहा था, जबर्दस्त…
- Verses 9–11उसके रोंगटे थे, प्रलय की समाप्ति तथा सृष्टि के आरम्भ में जैसे प्रथम सर्जे गये प्रजापति वि…
- Verse 12चिदात्मा में ही आकाशताप्रतीतिरूप आकाशात्मकता को प्राप्त हुए उन विपश्चितां ने मानसिक प्रति…
- Verse 13इस तरह निश्चित् देह के अज्ञानात्मक होनेपर यह दृश्य पृथिवी आदिरूप अविद्या कितनी बड़ी होगी…
- Verses 14–16दृश्य और दर्शन में से पृथिवीमण्डलरूप अनुभवाकार अविद्या का इतनी बड़ी है यों परिच्छेद को (प…
- Verse 17देहभाव का परित्याग कर वीतहव्य के उपाख्यान में वर्णित रीति से चित्त के सन्मात्ररूपता को प्…
- Verse 18पूर्व दिशा की ओर चला हुआ विपश्चित् पर्व में (पूर्णिमा के दिन) पूर्ण चन्द्रमा के बिम्ब के…
- Verses 19–23शंका - यह कथन ठीक नहीं है, क्योकि चारों शरीरो में एक ही विपश्वित्-जीव जैसे योगी का एक ही…
- Verse 24उस भूमि के बीच में मरकर वह विपश्चित् वैसे ही देवत्व को प्राप्त हुआ जैसे अग्नि के मध्य मे…
- Verse 25उक्त विपश्चित् देवश्रेष्ठ बनकर पूर्वजन्म की दिगन्तभ्रमण की वासना से वहाँ से लोकालोक पर्व…
- Verse 26उक्त लोकालोक पर्वत पचास हजार योजन ऊँचा है, उसका एक हिस्सा सूर्य के प्रकाश से लोगों के व्य…
- Verse 27लोकालोक पर्वतपर चढ़कर उसकी चोटीपर पहुँचे हुए तारों के लोक में स्थित उस देवभूत विपश्चित्…
- Verse 28उस जगह से वह लोकालोक महापर्वत के दूसरे भाग में गया, जहाँ अन्धकार ही अन्धकार है चारों ओर प…
- Verse 29उसके बाद यह कन्दुकाकार (गेंदाकार) भूगोल समाप्त हो गया । उसके बाद अन्धकार से परिपूर्णं महा…
- Verse 30हे श्रीरामचन्द्रजी, उस परिखा में भँवरे के समान, काजल के समान और तमाल के समान आकाश के बीच…