Guru's AddaGuru's Adda

Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 121

एक सौ उन्नीसवांँ सर्ग समाप्त एक सौ वीसवों सर्ग वायु, वृक्ष, भ्रमर, वनराजि, देवांगना, समुद्र की लहर, सुवर्णचुड़ पक्षी आदि का वर्णन।

32 verse-groups

  1. Verse 1सहचरो ने कहा : हे कमलनेत्र इस तरह का वियोग कालिककथाएँ कह रहा यह सत्री -पुरुष का जोड़ा इस…
  2. Verse 2क सहवर दिविध वायुओं का वर्णन करता ह / केले के गोफों के सुन्दर गुच्छों को फुलाने में पण्डि…
  3. Verse 3वनों से निकली हुई भाँति-भाँति की सुगन्धियों से हृष्टपुष्ट, स्वेदबिन्दुओं का पान करनेवाले…
  4. Verse 4कुछ पर्वतों के गुफारूपी गृहों में पैठकर घुमने में उद्योगी सिंहों की तरह क्षार समुद्र के व…
  5. Verses 5–6तमाल और ताड़ के पेड़ों में चंचल बच्चों की तरह क्रीड़ा के झूलनों से झुलाये गये, जलतरंगों स…
  6. Verse 7बाँसों के वन में विश्राम लेता हुआ यह वनवायु हस्तिनापुर की नारियों से सिखलाया गया हुआ-सा म…
  7. Verse 8जब से कर्णिकार ने सुगन्धि, पराग आदि न देकर वायु का तिरस्कार किया तभी से भ्रमर भी इसका (कर…
  8. Verse 9ताड का पेड़ खम्भे की तरह सीधा होता है, अतः उसपर कोई चढ़ नहीं सकता । इसीलिए वह किसी अर्थी…
  9. Verse 10उदारता आदि गुणों से रहित मूर्खो की वस्त्र, अलंकार आदि के आडम्बर से शरीर की सजावट ही शोभा…
  10. Verse 11के तुल्य इसके अनुसरण से क्या लाभ है ?
  11. Verse 12चंचल मंजरीराशिरूपी बिजली के संग से युक्त तथा काला तमालवृक्ष चातक को व्यर्थ ही मेघ की भ्रा…
  12. Verse 13ये ऊँचे बंस उन्नत कुल के समान हैं । उन्नत कुल के लोग पर्णो से (वाहनों से -रथ, हाथी, घोडे,…
  13. Verse 14जैसे सुवर्णमय शिखररूप आसन पर वैठनेवाला अतएव अग्नि में स्थित होनेवाला वायुरूप व्याधि से यु…
  14. Verse 15प्रवेश और निर्गम में उतावलीवाले पक्षी ओर भ्रमररूपी बाण जिसमें संचार कर रहे हैं ऐसा यह फूल…
  15. Verse 16महेनद्रपर्वत के शिखर पर मन्दारमंजरियों की राशियों की राशियों से पीले मेघरूपी मन्दिर में य…
  16. Verse 17हे राजन्‌ देखिये, कल्पवृक्षो के वन की शीतल छाया में विश्राम कर रहे, उत्तम वीणा आदि बाजों…
  17. Verse 18महाराज देखिये, इस कल्पद्रुम के वन में पल्लव पर बैठी हुई (विश्राम कर रहीं) देवांगनाएँ गाती…
  18. Verse 19सुन्दर-सुन्दर मन्विरों से भरे हुए मन्दराचल पर मन्दपाल मुनिका यह मन्दिर है, जिस उदार मन्दप…
  19. Verse 20राजन्‌, ये मुनिजनों के आश्रम, जिन पर जाति वैर का परित्याग कर आपस में गाढा स्नेह रखनेवाले…
  20. Verse 21मूँगों के वृक्षों से उलझी हुई सागरतट की लताओं के पल्लवो पर जलबिन्दु, जिन पर सुर्य का प्रत…
  21. Verse 22रत्न और मणियों की खानों में लहरें बार- बार परिवर्तना द्वारा वैसे ही क्रीडा करती हे जैसे क…
  22. Verse 23राजन्‌ सुनिये, नागलोक और इन्द्रलोक की स्त्रियों के गमनागमन से होनेवाला मनोहर आभूषण-झंकार…
  23. Verse 24एेरावत के गण्डस्थल से गिरे हुए मदजल से मस्त हुई भ्रमरियों की गुंजारध्वनियों से एेरावत के…
  24. Verse 25कृष्णपक्ष में दिनपर दिन घट रहे अतएव कृशकाय सागर की कृष्णान्तरेखारूप पंक्तियाँ निवास स्थान…
  25. Verses 26–27करोड सहवर दो श्लोक से वनों का ही विलासिनी के (स्त्री के) रूप से वर्णन करता हैं / वनरूपी व…
  26. Verse 28उदारमति देववृन्द आदि नन्दनवन में वैसा आनन्द नहीं लेते जैसा कि सूनसान (शब्दशून्य) शुद्ध वन…
  27. Verse 29अत्यन्त विरक्त मुनि के चित्त को ओर अनुरक्त विषयी पुरुष के चित्त को मनोहर निर्जन वनभूमियाँ…
  28. Verses 30–31सागर के तटवर्ती पर्वतो के, जिनके तट जलतरगों से धोये साफ सुथरे हैं, पाद (तलैटियाँ) समुद्री…
  29. Verse 32पुंनाग के वृक्षों पर विश्राम कर रहे सुन्दर सुवर्णकी-सी कान्तिवाले हेमचूड नाम के पक्षी (एक…
  30. Verse 33उत्कण्ठित कोयल (मादा) कनेर के पेड की ऊपर की शाखारूपी झूले में झूल रहे अपने प्रिय कोयल का…
  31. Verse 34हे राजन्‌, कलकलध्वनिपूर्वक उपायन (भेंट) हाथ में लिये हुए राजाओं से पूर्ण क्षीरसमुद्र की इ…
  32. Verse 35पूर्व, पश्चिम, दक्षिण और उत्तर क्षारसागर तक इस जम्बू द्वीप में भीषण युद्ध में बचे हुए नरप…