Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 121
एक सौ उन्नीसवांँ सर्ग समाप्त एक सौ वीसवों सर्ग वायु, वृक्ष, भ्रमर, वनराजि, देवांगना, समुद्र की लहर, सुवर्णचुड़ पक्षी आदि का वर्णन।
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- Verse 1सहचरो ने कहा : हे कमलनेत्र इस तरह का वियोग कालिककथाएँ कह रहा यह सत्री -पुरुष का जोड़ा इस…
- Verse 2क सहवर दिविध वायुओं का वर्णन करता ह / केले के गोफों के सुन्दर गुच्छों को फुलाने में पण्डि…
- Verse 3वनों से निकली हुई भाँति-भाँति की सुगन्धियों से हृष्टपुष्ट, स्वेदबिन्दुओं का पान करनेवाले…
- Verse 4कुछ पर्वतों के गुफारूपी गृहों में पैठकर घुमने में उद्योगी सिंहों की तरह क्षार समुद्र के व…
- Verses 5–6तमाल और ताड़ के पेड़ों में चंचल बच्चों की तरह क्रीड़ा के झूलनों से झुलाये गये, जलतरंगों स…
- Verse 7बाँसों के वन में विश्राम लेता हुआ यह वनवायु हस्तिनापुर की नारियों से सिखलाया गया हुआ-सा म…
- Verse 8जब से कर्णिकार ने सुगन्धि, पराग आदि न देकर वायु का तिरस्कार किया तभी से भ्रमर भी इसका (कर…
- Verse 9ताड का पेड़ खम्भे की तरह सीधा होता है, अतः उसपर कोई चढ़ नहीं सकता । इसीलिए वह किसी अर्थी…
- Verse 10उदारता आदि गुणों से रहित मूर्खो की वस्त्र, अलंकार आदि के आडम्बर से शरीर की सजावट ही शोभा…
- Verse 11के तुल्य इसके अनुसरण से क्या लाभ है ?
- Verse 12चंचल मंजरीराशिरूपी बिजली के संग से युक्त तथा काला तमालवृक्ष चातक को व्यर्थ ही मेघ की भ्रा…
- Verse 13ये ऊँचे बंस उन्नत कुल के समान हैं । उन्नत कुल के लोग पर्णो से (वाहनों से -रथ, हाथी, घोडे,…
- Verse 14जैसे सुवर्णमय शिखररूप आसन पर वैठनेवाला अतएव अग्नि में स्थित होनेवाला वायुरूप व्याधि से यु…
- Verse 15प्रवेश और निर्गम में उतावलीवाले पक्षी ओर भ्रमररूपी बाण जिसमें संचार कर रहे हैं ऐसा यह फूल…
- Verse 16महेनद्रपर्वत के शिखर पर मन्दारमंजरियों की राशियों की राशियों से पीले मेघरूपी मन्दिर में य…
- Verse 17हे राजन् देखिये, कल्पवृक्षो के वन की शीतल छाया में विश्राम कर रहे, उत्तम वीणा आदि बाजों…
- Verse 18महाराज देखिये, इस कल्पद्रुम के वन में पल्लव पर बैठी हुई (विश्राम कर रहीं) देवांगनाएँ गाती…
- Verse 19सुन्दर-सुन्दर मन्विरों से भरे हुए मन्दराचल पर मन्दपाल मुनिका यह मन्दिर है, जिस उदार मन्दप…
- Verse 20राजन्, ये मुनिजनों के आश्रम, जिन पर जाति वैर का परित्याग कर आपस में गाढा स्नेह रखनेवाले…
- Verse 21मूँगों के वृक्षों से उलझी हुई सागरतट की लताओं के पल्लवो पर जलबिन्दु, जिन पर सुर्य का प्रत…
- Verse 22रत्न और मणियों की खानों में लहरें बार- बार परिवर्तना द्वारा वैसे ही क्रीडा करती हे जैसे क…
- Verse 23राजन् सुनिये, नागलोक और इन्द्रलोक की स्त्रियों के गमनागमन से होनेवाला मनोहर आभूषण-झंकार…
- Verse 24एेरावत के गण्डस्थल से गिरे हुए मदजल से मस्त हुई भ्रमरियों की गुंजारध्वनियों से एेरावत के…
- Verse 25कृष्णपक्ष में दिनपर दिन घट रहे अतएव कृशकाय सागर की कृष्णान्तरेखारूप पंक्तियाँ निवास स्थान…
- Verses 26–27करोड सहवर दो श्लोक से वनों का ही विलासिनी के (स्त्री के) रूप से वर्णन करता हैं / वनरूपी व…
- Verse 28उदारमति देववृन्द आदि नन्दनवन में वैसा आनन्द नहीं लेते जैसा कि सूनसान (शब्दशून्य) शुद्ध वन…
- Verse 29अत्यन्त विरक्त मुनि के चित्त को ओर अनुरक्त विषयी पुरुष के चित्त को मनोहर निर्जन वनभूमियाँ…
- Verses 30–31सागर के तटवर्ती पर्वतो के, जिनके तट जलतरगों से धोये साफ सुथरे हैं, पाद (तलैटियाँ) समुद्री…
- Verse 32पुंनाग के वृक्षों पर विश्राम कर रहे सुन्दर सुवर्णकी-सी कान्तिवाले हेमचूड नाम के पक्षी (एक…
- Verse 33उत्कण्ठित कोयल (मादा) कनेर के पेड की ऊपर की शाखारूपी झूले में झूल रहे अपने प्रिय कोयल का…
- Verse 34हे राजन्, कलकलध्वनिपूर्वक उपायन (भेंट) हाथ में लिये हुए राजाओं से पूर्ण क्षीरसमुद्र की इ…
- Verse 35पूर्व, पश्चिम, दक्षिण और उत्तर क्षारसागर तक इस जम्बू द्वीप में भीषण युद्ध में बचे हुए नरप…