Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 113, Verses 39–41
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 113, verses 39–41 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 113 · श्लोक 39
संस्कृत श्लोक
भूरिसीकरपुष्पाणि तरङ्गौघतरूणि च ।
प्राप्तान्यम्बुवनानीव लहरीमञ्जरीणि खम् ॥ ३९ ॥
सरत्तरङ्गजालानि प्रोड्डीनप्राणिमन्त्यधः ।
आकाशखण्डखण्डत्वात्पतितानीव विभ्रमात् ॥ ४० ॥
एलालवंगबकुलामलकीतमालहिंतालतालदलताण्डवखण्डिताग्रे ।
प्राप्ते पतल्लवणवारिधिदीर्घतीरं रेखा बभावलिनिभाम्बरशैलमूर्ध्नि ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
केवल सागरो में ही लीन नहीं हुए किन्तु खेतों में, जंगलों में, नगरों
में, जलों में, स्थलों में, पहाड़ों में, नदी और समुद्र के तटों में, नहरों मे, ब्राह्मणों को दिये गये
माफी ग्रामों में, नदियों में, समुद्रों मे, भृगुओं मे, वृक्षों में, कसबों में, खुश्क जगहों में, पर्वतों में,
कुओं में, गुहाओं में, गृहों मे विनष्ट हुए भगोड़े सैनिकों को बचाने में कौन समर्थ था ?