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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 11

दसवाँ सर्ग समाप्त ग्यारहवाँ सर्ग इन्द्रियों को जीतकर पूर्ण ब्रह्म परमात्मा में मन की स्थिति तथा देह आदि दृश्य पदार्थों में अनात्मभावना दृढ़ करनी चाहिए, यह वर्णन ।

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  1. Verse 1भुशुण्डजी ने कहा : हे विद्याधर, वस्त्रों से ढके अपने शरीर में लगे हुए शत्रो के आघात और तर…
  2. Verse 2इरी अर्थ को स्पष्टरूप से कहते हैं / बड़े धैर्य के साथ अपने पुरुष प्रयत्न के द्वारा मनुष्य…
  3. Verse 3मानप्रिक पीड़ाओं का संस्पर्श न होना ही ढ़ तत्वज्ञान का लक्षण है, यह कहते हैं । यथार्थ परम…
  4. Verse 4आकाश के सदृश स्वच्छ विविध प्रकार के चमकते हुए शस्त्रों तथा देदीप्यमान अनेक स्त्रियों के अ…
  5. Verses 5–6जैसे विष अपने ही स्वरूप में घुण (कीड़ा) आदि विकारभाव को प्राप्त होता है ओर वह घुणता भी वि…
  6. Verse 7अमरणस्वभाव जड़ विष अपने विषस्वभाव को न छोड़ते हुए ही जैसे मरणस्वभाव कीटरूप जीव होता हे वै…
  7. Verse 8घुण की नाई उत्पन्न हुए जीव की तरह यह सारा सार भी उत्पन्न हुआ है यह कहते हैं / विष में कीट…
  8. Verse 9कनि में जैसे विकस्वभावद्वष्टि से जन्म और मरण नहीं होते, परन्तु आत्मस्वभावद्रष्टि से तो हो…
  9. Verse 10देह, इन्द्रिय आदि विषय पदार्थों में अहन्ता- ममता की आसक्ति से अपने स्वरूप को तिरोहित न कर…
  10. Verse 11सम्पूर्ण दृश्य पदार्थो का बाध हो जाने पर परिशिष्ट बचे परम दरि्रकृपी एक आत्मस्वरूप में भला…
  11. Verse 12अहंकार, बुद्धिआदिरूप भला कौन-सा कलंक रह सकता है ?
  12. Verse 13जैसे घट, पट आदि पदार्थों को तुम तटस्थरूप से देख रहे हो, वैसे ही हे विद्याधर, अहन्ता आदि क…
  13. Verse 14तदनन्तर हे विद्याधर, सर्वसाक्षिस्वरूप होकर तुम बाह्य जगत्‌ के सम्पूर्णं पदार्थो तथा आन्तर…
  14. Verse 15उम्र स्थिति में सम्पूर्ण गुण, दोष आदि के विक्षेपों के हेतुओं की शान्ति रहती है, यह कहते ह…