Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 11, Verse 3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 11, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
यथा भूतार्थतत्त्वज्ञमाधयोऽग्रगता अपि ।
न मनागपि लिम्पन्ति पयांसीव सरोरुहम् ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
मानप्रिक पीड़ाओं का संस्पर्श न होना ही ढ़ तत्वज्ञान का लक्षण है, यह कहते हैं ।
यथार्थ परमात्मतत्त्व को जाननेवाले पुरुष को सामने उपस्थित भी मानसिक पीड़ाएँ (५)
तनिक भी ऐसे नहीं लिप्त कर पाती जैसे कमल को जल नहीं लिप्त कर पाते