Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 11, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 11, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
तावत्पुरुषयत्नेन धैर्येणाभ्यासमाहरेत् ।
यावत्सुषुप्ततोदेति पदार्थोदयनं प्रति ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
इरी अर्थ को स्पष्टरूप से कहते हैं /
बड़े धैर्य के साथ अपने पुरुष प्रयत्न के द्वारा मनुष्य को तब तक इन्द्रियों के ऊपर विजय प्राप्त
करने का अभ्यास निरन्तर करते रहना चाहिए, जब तक कि शस्त्र ओर कान्ता, आदि बाह्य पदार्थों
से उत्पन्न हो रहे विकारों को मिथ्यात्व बुद्धि से दूर फेंककर एकमात्र स्वात्मसुख विश्रान्तिरूप
सुषुप्तता नहीं उदित हो जाती