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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 11, Verse 8

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 11, verse 8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 11 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

ब्रह्मण्यनन्योऽप्यन्याभो दुर्घुणः क्वचिदुत्थितः । तत्स्थः स एवास इवाप्यतत्स्थ इव सर्गकः ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

घुण की नाई उत्पन्न हुए जीव की तरह यह सारा सार भी उत्पन्न हुआ है यह कहते हैं / विष में कीट के समान ब्रह्म में ब्रह्म से अनन्य होते हुए भी उससे अन्य सदृश भासमान यह सृष्टिरूप दुष्ट घुण भी कहीं से आविर्भूत हुआ है। यद्यपि यह उसी में स्थित उसी का रूप है तथापि उससे अन्य और उसमें स्थित नहीं सा भासता है