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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 105

8 verse-groups

  1. Verses 1–2जायेगी / इक्त प्रकार रूपरहित वायु से भी रृपतन्मात्र की उत्पत्ति का आरम्भ से (आरस्भकादानुल…
  2. Verse 3यदि कोई कहे कि अनुभव से ही कूटस्थ आकाश से चलनात्मक कायु की उत्पत्ति, रूपरहित वायु से रूपव…
  3. Verse 4उरी प्रिद्धान्त का प्रतिपादन करते हैं / अति निर्मल संवित्‌ ही अपने स्वरूप में भासित होती…
  4. Verse 5न तो कहीं पर पाँच भूत हैं और न घट, दीवार आदि भौतिक पदार्थ ही हैं, किन्तु फिर भी जैसे स्वप…
  5. Verse 6जैसे स्वप्न में चित्स्वभाव आत्मा ही नगर पर्वत, आदि के तुल्य प्रकाशित होता है वैसे ही जाग्…
  6. Verse 7मैं चेतनाकाश ही हूँ, यह जगत्‌ भी चेतनाकाश रूप ही स्थित है, इसलिए मैं और जगत्‌ दोनों एक ही…
  7. Verse 8जो आदि सृष्टि में जगत्‌ की उत्पत्ति है और कल्प में (प्रलय में) उसकी निवृत्ति है अथवा जो ज…
  8. Verses 9–45निर्मल आत्मस्वरूप के ज्ञात हो जानेपर जो दुःखलेशशून्य अक्षय सुखता (भूमानन्दरूपता) है, वही…