Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 105, Verses 1–2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 105, verses 1–2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 105 · श्लोक 1,2
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
स्वभावं जगदाकारं चिद्भावोऽनुभवन्स्थितः ।
स्वतः स्वप्नमिवानन्यमात्मनः कल्पनाभिधम् ॥ १ ॥
जाग्रत्सुषुप्तमेवेदं शिलाजठरमेव वा ।
आकाशमेव वा शून्यं जगत्त्वेन च नोज्झितम् ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
जायेगी / इक्त प्रकार रूपरहित वायु से भी रृपतन्मात्र की उत्पत्ति का आरम्भ से
(आरस्भकादानुलार) या परिणाम से (परिणामवादानुच्मार) निरूपण करना कठिन ही नहीं असभव
ही हैं / कारण कि कारण के गुण कार्य के गुणो के आरस्भक होते हैं; ऐसा नियम है / वायु में
रूप का अभाव हैं / परिपाक से परिणाम होता है ओर तेज के बिना परिपाक की भी संभावना
नहीं हैं, इसी प्रकार अग्नि, जल आदि उत्तरवर्ती भ्रूर्तों नें भी समझ लेना वाहिये।