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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 105, Verse 4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 105, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 105 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

त्रैलोक्यमसदेवेदं यथा स्वप्नेऽवभासते । जाग्रत्यस्मिंस्तथैवेदं मनागप्यत्र नान्यथा ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

उरी प्रिद्धान्त का प्रतिपादन करते हैं / अति निर्मल संवित्‌ ही अपने स्वरूप में भासित होती है, यह कथन “वही जगत हे" यों परमार्थ सत्यस्वरूप अधिष्ठान के बल से तथा “यह सब ब्रह्म ही है" इत्यादि यथार्थवादिनी श्रुति के बल से सत्य ही है, यह सिद्धान्त रहस्य हम पहले ही कह चुके हैं