Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 103
एक सौ ढोवाँ सर्ग समाप्त एक सौ तीनवाँ सर्ग चिति की नित्यता, एकता तथा स्वातंत्र्य का साधन तथा इस सत्-शास्त्र की महिमा और हितोपदेश का वर्णन।
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- Verse 1सबसे पहले विकिलामान्य की अविनाशीता का सवके अनुभव बल से साधन करते हैं / श्रीवसिष्ठजी ने कह…
- Verse 2अविनाशी पुरुष विन्मात्रस्वरूय रहे, इससे प्रक्रत मे क्या आया 2 इस पर कहते हैं / चूँकि पुरु…
- Verse 3सादृश्य है । उसकी भला कैसी भिन्नता होगी ? अर्थात् वह अन्यता मिथ्या ही है (७)
- Verse 4यदि कड कहे कि पुरुष के भेद से वितिका भेद होगा, तो उस्र पर कालभेद की तरह पुरुषभेद से भी वि…
- Verse 5चुख-दुः:खरूप ज्ञान के सिवा चैतन्य कुछ नहीं है / विशेष ज्ञान में अवच्छेदकता सम्बन्ध से शरी…
- Verses 6–69शरीर का नाश होने पर चिदाकाश कभी नष्ट नहीं होता । क्योकि बन्धुओं का शरीर नष्ट होने पर भी म…
- Verses 70–99जब तक शरीर है तभी तक चेतन की सत्ता है, यदि यह कहा जाय तो यह कहना भी ठीक नहीं है, क्योकि अ…