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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 103, Verse 4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 103, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 103 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

सर्वस्यैव हिमं शीतमुष्णोऽग्निर्मधुरं पयः । चिन्मात्रस्यावदातस्य कीदृगन्यत्वमत्र तु ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कड कहे कि पुरुष के भेद से वितिका भेद होगा, तो उस्र पर कालभेद की तरह पुरुषभेद से भी वितिका भेद सिद्ध नहीं किया जा सकता; क्योकि हिम आदि में शैत्य आदि की तरह चिति में भी किक विलक्षणता का अनुभव नहीं होता, ऐसा कहते हैं / जब सभी लोगों को हिम शीतल है, अग्नि उष्ण है तथा दुग्ध मधुर है यों भासता है, तो फिर इस निर्मल चिन्मात्र में ही भेद कैसे भासेगा ?