Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 90, Verses 9–10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 90, verses 9–10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 90 · श्लोक 9,10
संस्कृत श्लोक
स्वदेशस्यातिदूरस्थमागतोऽसि ममाश्रमम् ।
भुवोऽन्तमिव विश्रान्त्यै वैनतेयः सकच्छपः ॥ ९ ॥
केवलं सर्वसंत्यागे शेषिताहंमतिस्त्वया ।
मृष्टाखिलकलङ्केन स्वसत्तेवानिलेन खे ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
स्वदेश से बहुत दूर में स्थित आप मेरे आश्रम में विश्रान्ति के लिए ऐसे आ गये हैँ, जैसे कच्छप, गज
आदि भोजन के साथ गरुड भगवान् विश्रान्ति के लिए पृथिवी की अन्त सीमा में आ गये थे (70) आपने
सर्वत्याग में केवल अभिमानरूप अविद्या को ही उस तरह बचा रखा हे, जिस तरह मेघ, नीहार आदि
सब कलंकों को धो डालनेवाला शरत्कालीन वायु आकाश में अपनी सत्ता को