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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 90, Verse 11

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 90, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 90 · श्लोक 11

संस्कृत श्लोक

मनोमात्रे हृदस्त्यक्ते जगदायाति पूर्णताम् । त्यागात्यागविकल्पैस्त्वं खमम्भोदैरिवावृतः ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

अहंकार का परित्याग हो जाने पर अवशिष्ट रहा पूणनिन्दस्वरूप परमयुरुषार्थ अपने-आप हृद्य में साक्षात्‌ स्फुरित होने लगता है, इसलिए सर्वत्याग ही मोक्ष सिद्ध हआ । परमानन्द ही चिन्तामणि है । चिन्तामणि मिल जाने पर उसकी उपेक्षा करके किसी और दूसरी वस्तु का अन्वेषण नहीं करना चाहिए, यह कहते हैं । हृदय से मनोमात्र के त्यक्त हो जाने पर सारा संसार पूर्णानन्द ब्रह्मस्वरूप हो जाता है, लेकिन आप तो मेघों से आवृत आकाश की नाई त्याग और अत्याग के विकल्पों से आवृत हैं, क्योकि 'मैंने सब कुछ छोड़ दिया" यह अभिमान तो अभी आपमें बचा ही है