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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 83, Verses 16–18

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 83, verses 16–18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 83 · श्लोक 16-18

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । अत्यन्तकृपणः कश्चित्किराटो धनधान्यवान् । अस्ति विन्ध्याटवीकक्षे कुटुम्बी ब्राह्मणो यथा ॥ १६ ॥ तस्यैकदा निपतिता गच्छतो विन्ध्यजङ्गले । एका वराटिका राम तृणजालकसंवृते ॥ १७ ॥ कार्पण्यात्स प्रयत्नेन सर्वं तृणतुषादिकम् । कपर्दकार्थमभितो दुधाव दिवसत्रयम् ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

स्थूलारन्धतीन्याय से शिष्य की बुद्धि को आत्मा में व्यस्त कर गुरु का उपदेश ज्ञान का कारण होता है, यह कहने के लिए महाराज वस्रिष्ठजी किराटोपाख्यान कहते हैं। महाराज वसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, विन्ध्याचल के प्रदेश में धनधान्य से सम्पन्न अत्यन्त कृपण कोई एक किराट (देहाती बनिया) उस तरह रहता था, जिस तरह कोई एक सपरिवार ब्राह्मण रहता हो हे श्रीरामजी, विन्ध्याचल के जंगल में जाते हुए उसकी एक कौड़ी किसी तृणसमूहों से संवृत्त स्थान में गिर पड़ी अपनी कृपणता के कारण उस एक कौड़ी के लिए वह बड़े प्रयत्न से तीन दिन तक चारों ओर तृण-फूस आदि सबकी सफाई करता रहा