Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 83, Verses 19–25
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 83, verses 19–25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 83 · श्लोक 19-25
संस्कृत श्लोक
कपर्दकाः स्युर्भवता चत्वारोऽष्टौ च कालतः ।
ततः शतं सहस्रं च सहस्रे चेति चेतसा ॥ १९ ॥
कलयञ्जङ्गले दीनो रात्रिंदिवमतन्द्रितः ।
जनहाससहस्राणि बुबुधे न परं तु सः ॥ २० ॥
ततो दिनत्रयस्यान्ते तेन तस्माच्च जङ्गलात् ।
पूर्णेन्दुबिम्बप्रतिमो लब्धश्चिन्तामणिर्महान् ॥ २१ ॥
तं प्राप्य तुष्टहृदयः समागम्य गृहं सुखम् ।
प्राप्ताखिलजगद्भूतिः शान्तसर्वतया स्थितः ॥ २२ ॥
एवं यथा किराटेन कपर्दान्वेषणेन तत् ।
रत्नं लब्धं जगन्मूल्यमहोरात्रमखेदिना ॥ २३ ॥
तथा श्रुतोपदेशेन स्वात्मज्ञानमवाप्यते ।
अन्यदन्विष्यते चान्यल्लभ्यते हि गुरुक्रमात् ॥ २४ ॥
ब्रह्म सर्वेन्द्रियातीतं श्रुतादीन्द्रियसंविदः ।
तेनोपदेशादनघ नात्मतत्त्वमवाप्यते ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
वह किस अभिप्राय से एक कौड़ी इतने परिश्रम से ढूँढ़ रहा था, यह बतलाते हैं।
यदि यह कौड़ी मेरे हाथ मेँ आ जाय तो इस एक कौड़ी से मैं कोई चीज खरीद लेता और उसे बेच
डालता, उस खरीद और बिक्री से चार कौड़ियाँ मेरे पास हो जाती । उनसे फिर समय पाकर आठ,
उनसे सौ, सौ कौड़ियों से हजार और फिर उनसे दो हजार कौड़ियाँ मेरे पास आ जातीं; यों अपने चित्त
से विचार करता हुआ वह कृपण रात-दिन आलस्यरहित होकर जंगल में उस एक कौड़ी की खोज
करता रहा उसने मनुष्यों के हजारों हास्यों की तनिक भी परवा न की । तदनन्तर तीन दिन के कड़े
परिश्रम के अन्त में उसी जंगल में उसने पूर्ण चन्द्रबिम्ब के सदूश एक महान् चिन्तामणि की प्राप्ति की।
उस चिन्तामणि को ले करके सन्तुष्ट हृदय हो घर आकर वह कृपण किराट सांसारिक सम्पूर्ण भोगसमूहों
की प्राप्ति हो जाने तथा अपने सब दारिद्रयादि अनर्थो की समाप्ति हो जाने के कारण सुख पूर्वक
स्थित रहने लगा । इस तरह रात-दिन घोर परिश्रम के साथ खेदरहित किराट ने जिस तरह एक कोडी
खोजने में चिन्तामणि रत्न पाया, जिसका मूल्य जगत् ही है, उसी तरह श्रुतोपदेश से स्वात्मज्ञान भी
प्राप्त किया जाता है। गुरु के उपदेशक्रम से दूसरे शब्दजन्य परोक्ष ज्ञान का अन्वेषण होता है ओर दूसरे
नित्य अपरोक्ष आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है । हे पापशून्य श्रीरामजी, ब्रह्म सम्पूर्ण इन्द्रियवृत्तियों से
अतीत है ओर उपदेश से तो शब्द-श्रवण एवं श्रवण-जन्य शाब्दबोध आदि इन्द्रियसम्प्रयोज्य
चित्तवृत्तिर्यो उत्पन्न होती हैं | गुरू के उपदेश से जो शाब्ववृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं, उन में अत्यन्त
स्वच्छ चरमवृत्ति में नित्य अपरोक्ष ब्रह्म का जो स्फुरण होता है वह तो शिष्यों की स्वच्छ बुद्धि और
ब्रह्मस्वभाव प्रयुक्त ही होता है । इसलिए गुरु के उपदेश से आत्मतत्त्व प्राप्त नहीं किया जाता अर्थात्
आत्मज्ञान में उपदेश कारण नहीं है