Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 83, Verses 3–15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 83, verses 3–15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 83 · श्लोक 3-15
संस्कृत श्लोक
क्षणमप्यगता भर्तुर्वक्षसश्चेतसस्तथा ।
सर्वेषूवास राज्येषु लक्ष्मीरिव जगत्सु च ॥ ३ ॥
आकाशगामिनी श्यामा विद्युत्प्रारम्भभूषणा ।
बभ्राम मेघमालेव गिरिमाला महीतले ॥ ४ ॥
काष्ठं तृणोपलं भूतं खं वातमनलं जलम् ।
निर्विघ्नमविशत्सर्वं तन्तुर्मुक्ताफलं यथा ॥ ५ ॥
मेरोरुपरि श्रृङ्गाणि लोकपालपुराणि च ।
दिग्व्योमोदररन्ध्राणि विजहार यथासुखम् ॥ ६ ॥
तिर्यग्भूतपिशाचाद्यैः सहनागामरासुरैः ।
विद्याधराप्सरःसिद्धैर्व्यवहारं चकार सा ॥ ७ ॥
यत्नेन तं च भर्तारमात्मज्ञानामृतं प्रति ।
बहुशो बोधयामास चूडाला न विवेद सः ॥ ८ ॥
कलाविदग्धा मुग्धा च बालेयं गृहिणी मम ।
इत्येवं केवलं राजा स चूडालां विवेद ताम् ॥ ९ ॥
एतावतापि कालेन तामेवंगुणशालिनीम् ।
बालो विद्यामिव नृपश्चूडालां न विवेद सः ॥ १० ॥
साप्यलब्धात्मविश्रान्तेस्तां सिद्धिश्रियमात्मनः ।
दर्शयामास नो राज्ञः शूद्रस्येव मखक्रियाम् ॥ ११ ॥
श्रीराम उवाच ।
महत्याः सिद्धयोगिन्यास्तस्या अपि शिखिध्वजः ।
यत्नेन प्राप नो बोधं बुध्यतेऽन्यः कथं प्रभो ॥ १२ ॥
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
उपदेशक्रमो राम व्यवस्थामात्रपालनम् ।
ज्ञप्तेस्तु कारणं शुद्धा शिष्यप्रज्ञैव राघव ॥ १३ ॥
न श्रुतेन न पुण्येन ज्ञायते ज्ञेयमात्मनः ।
जानात्यात्मानमात्मैव सर्पः सर्पपदानि व ॥ १४ ॥
श्रीराम उवाच ।
एवंस्थिते वाथ मुने कथमेतज्जगत्स्थितौ ।
क्रमो गुरूपदेशाख्यः स्वात्मज्ञानस्य कारणम् ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
उसके कल्पित कायव्यूहादि ऐश्वर्य का वर्णन करते हैं।
वह अपने पति के वक्षःस्थल तथा चित्त से क्षणभर के लिए भी अलग नहीं होती थी तथा सब
राज्यों एवं सम्पूर्ण भुवनों में लक्ष्मी की नाई निवास करती थी । बिजली के उन्मेष की नाई चमक रहे
आभूषणों से युक्त वह श्यामा चूडाला आकाशगामिनी होकर उस तरह घूमती-फिरती थी, जिस तरह
गिरिमालाओं से युक्त पृथिवी पर श्यामा मेघमाला । काष्ठ, तृण, पत्थर, भूत, आकाश, वायु, अग्नि
ओर जल सब में निर्विघ्नतापूर्वक उसने, मोतिया मे धागे की नाई, प्रवेश किया | सुमेरू पर्वत के ऊपर
चोटियों पर, लोकपालों के नगरों में तथा दिशा ओर आकाश के उदर में जितने भुवन-षिद्र प्रसिद्ध हैं
उन सबं मे उसने सुखपूर्वक विहार किया । पशु-पक्षी, भूत, पिशाच आदि; नाग, देव, असुर, विद्याधर;
अप्सरा ओर सिद्ध पुरुषों के साथ उसने सम्भाषण आदि व्यवहार किये । और बड़े यत्न के साथ,
अनेक बार उस चूडाला ने अपने स्वामी को ज्ञानामृत का उपदेश दिया, परन्तु वह कुछ भी समझ न
सका | उस चूडाला के विषय में-सम्पूर्ण कलाओं में विदग्धा, मुग्धा तथा यह मेरी गृहिणी है, केवल
इतना ही वह राजा शिखिध्वज जानता था । इतना लम्बा समय निकल जाने पर भी इस तरह अनेक
अणिमादि सिद्धिरूप गुणों से सुशोभित उस चूडाला को वह राजा उस तरह नहीं जान पाया, जिस
तरह वेदाध्ययन करते समय बालक वेदविद्या को गुणशालिनी यानी सम्पूर्णं पुरुषार्थो में अनुकूल
अर्थप्रकाशन आदि गुणों से शोभित नहीं जान पाता । आत्मविश्रान्ति न पाये हुए राजा को उस चूडाला
ने भी अपनी अणिमादि सिद्धियों की वह अलौकिक श्री उस तरह नहीं दिखलायी, जिस तरह शूद्र को
यज्ञक्रिया नहीं दिखलायी जाती । श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे प्रभो, बहुत बडी सिद्धयोगिनी उस चूडाला
के भी यत्न से जब राजा शिखिध्वज को ज्ञान प्राप्त न हो सका, तब भला दूसरे को कैसे ज्ञान प्राप्त
हो सकता है ? महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, गुरुजी द्वारा उपदेश प्राप्त करनेका क्रम
तो केवल “तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्" (आत्मविज्ञान के लिए गुरु के ही समीप पहुँचे) इत्यादि
शास्त्रीय मर्यादा का पालनमात्र ही है, अतः यह अनधिकारी पुरुष में जबरदस्ती ज्ञान उत्पन्न नहीं कर
सकता। हे राघव, ज्ञान का कारण तो शिष्य की विशुद्ध बुद्धि ही हे । तकादि अनात्मशास्त्रों मे प्रवीणता
से, किसी पुण्य से यानी चित्तशुद्धि के अंगभूत श्रौत कर्म वर्ग से अपना तत्त्वभूत ज्ञेय ब्रह्म नहीं जाना
जाता-इतर वस्तुओं की तरह विषयीभूत नहीं किया जाता तात्पर्य यह हुआ कि जैसे काम्य पुण्यकर्म
से बिना विचार के ही स्वर्ग मिल जाता है, वैसे हजारों पुण्यकर्म करने पर भी बिना आत्मविचार के
ज्ञान उत्पन्न नहीं होता । किन्तु तर्कादि अनात्मशास्त् मे प्रवीणता तथा निष्काम पुण्यकर्म - इन दोनों
से आत्मविचार के उत्पन्न हो जाने पर चरमवृत्ति में आरूढ हुआ आत्मा ही आत्मा को उस तरह जानता
है जिस तरह सर्प सर्पबिल को जानता है । श्रीरामजी ने कहा : हे मुने, जब ऐसी स्थिति विद्यमान है,
तब भला आप ही बतलाइये कि इस जगत् की स्थिति में स्वात्मज्ञान का कारण गुरुपदेश का क्रम हे,
यह किस तरह उपपन्न होगा