Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 82, Verses 2–9

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 82, verses 2–9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 82 · श्लोक 2-9

संस्कृत श्लोक

हृद्यब्जचक्रकोशोर्ध्वं प्रस्फुरत्यानलः कणः । हेमभ्रमरवत्सांध्यविद्युल्लव इवाम्बुदे ॥ २ ॥ स प्रवर्धनसंवित्त्या वात्ययेवाशु वर्धते । संविद्रूपतया नूनमर्कवद्याति चोदयम् ॥ ३ ॥ संध्याभ्रप्रथमार्काभो वृद्धिमभ्यागतः क्षणात् । गालयत्यखिलं साङ्गं देहं हेम यथानलः ॥ ४ ॥ जलस्पर्शासहो युक्त्या गलयेत्प्रपदादपि । बाह्य एवानलः स्पर्शात्स्वान्ते वस्तुविशेषतः ॥ ५ ॥ स शरीरद्वयं पश्चाद्विधूय क्वापि लीयते । विक्षोभितेन प्राणेन नीहारो वात्यया यथा ॥ ६ ॥ आधारनाडीनिर्हीना व्योमस्थैवावशिष्यते । शक्तिः कुण्डलिनी वह्नेर्धूमलेखेव निर्गता ॥ ७ ॥ क्रोडीकृतमनोबुद्धिमयजीवाद्यहंकृतिः । अन्तःस्फुरच्चमत्कारा धूमलेखेव नागरी ॥ ८ ॥ विसे शैले तृणे भित्तावुपले दिवि भूतले । सा यथा योज्यते यत्र तेन निर्यात्यलं तथा ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

उनमें सबसे पहले, अणुत्व की प्राप्ति के लिए देह का विलोप कर देना अत्यन्त आवश्यक है, इसलिए हृदय-कमल-नाल के यूक्ष्म छिद्रों द्वारा हृदयाकाश में प्रवेशकर नाभि के ऊपर जलती हुई जठराग्नि की-हृदयकमल के छत्ते में परमात्मा की आसनस्वरूप-शिखा दिखलाते हैं। हृदय में कमलचक्र की कर्णिका के (छत्ते के) ऊपर अग्नि का कण उस तरह चमकता है, जिस तरह सुवर्णं का भ्रमर या सायंकाल को बादल में बिजली की लेखा। जैसे लौकिक अग्निकण झंझावात से शीघ्र वृद्धि प्राप्त करता है और सारे शरीर में व्याप्त होकर उसे जला देता है, वैसे ही झंझावात के सदृश प्रवर्द्धन के उपायभूत ज्ञान से वह संविद्रूप अग्निकण शीघ्र बढ़ता है और वह बढ़कर लौकिक अग्निकण की तरह देह को जलाता नहीं, किन्तु संविद्रूप होने से सूर्य के समान देह को अतिशय प्रकाश से युक्त बना देता है। प्रातःकाल में आकाश में सबसे पहले उदित सूर्य की कान्ति के समान क्षणभर में ही वृद्धि को प्राप्त होकर वह अग्निकण हाथ, पैर आदि अंगों के साथ सम्पूर्ण शरीर को इस तरह गला देता है, जिस तरह सुवर्ण को अग्नि | अर्थात्‌ वह पार्थिव गन्ध ओर कठिनता का जल में उपसंहार कर देता है। इस तरह पैर के अग्रभाग तक को भी वह युक्ति से गला देता है । उसके बाद शोषणयुक्ति से अपने अग्निस्वभाव के कारण जलस्पर्श को न सह सकनेवाला वह अग्नि अपनी उष्णता के बल से द्रवत्वोपसंहाररूप युक्ति से जल को भी सुखा देता है । इस रीति से देह से बाहर हुआ वह मनोरूप आतिवाहिक देहमात्र में अवस्थित रहता हे । यों पार्थिव तथा जलमय दोनों शरीरों को गलाकर वह अग्नि पीछे विक्षोभित प्राणवायु के द्वारा उपसंहत होकर कहीं इस तरह विलीन हो जाती है, जिस तरह झंझावात से नीहार। उस समय कुण्डलिनी शक्ति भी मूलाधारस्थ सुषुम्ना नाड़ी से हीन होकर सुषुम्ना के संस्कार से युक्त आतिवाहिक देहाकाश में ऐसे अवस्थित हो जाती है, जैसे अग्नि से निकली हुई धूम्र की लेखा ओर आतिवाहिक देहाकाश मेँ स्थित हुई; मन, बुद्धि, जीव आदि से घटित लिंग शरीर में अहंकार को संकलित करनेवाली तथा आभ्यन्तर मेँ स्वेच्छाविहारशक्ति एवं चित्‌-चमत्कार से युक्त वह कुण्डलिनी इस तरह शोभित होती है, जिस तरह नगर की धूमलेखा तथा कमलनाल, पर्वत, तृण, दीवार, पत्थर, स्वर्ग ओर भूतल आदि जिस किसी जगह जिस रीति से प्रविष्ट होकर निकल जाने के लिए उद्युक्त की जाती है उस जगह उस रीति से वह प्रविष्ट होकर ठीक तरह निकल जाती है