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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 82, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 82, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 82 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । अणुतां स्थूलतां वापि यथा गच्छति योगिनाम् । देहो नाम तथा सम्यग्वक्ष्यमाणमिदं श्रृणु ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

इस तरह देह आदि अग्नि और चन्द्रस्वरूप है, इसका परिज्ञानकर तीनों धारणाओं के अभ्यास से परिष्कृत हुए प्राण, मन और शरीर से युक्तः चन्द्र, सूर्य ओर अग्नि के संक्रमण आदि का अवलोकन करनेवाले योगी को देहमे अणिमादि सिद्धियों की प्राप्ति कैसे होती है, यह कहने के लिए महाराज वस्िष्ठजी प्रतिज्ञा करते है । महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, योगियों की देह जिस तरह अणुता या स्थूलता को प्राप्त होती है, वह सब अच्छी तरह मैं कहूँगा, आप सुनिये

सर्ग सन्दर्भ

इक्यासीरवौँ सर्ग समाप्त बयासीवाँ सर्ग अणुता ओर स्थूलता सिद्धि के उपाय, ज्ञानसाध्य वस्तु, योगियों के परकाय में प्रवेश तथा भोग आदि का युक्तिपूर्वक वर्णन ।