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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 82, Verses 10–11

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 82, verses 10–11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 82 · श्लोक 10,11

संस्कृत श्लोक

संवित्तिः सैव यात्यङ्ग रसाद्यन्तं यथाक्रमम् । रसेनापूर्णतामेति तन्त्रीभार इवाम्बुना ॥ १० ॥ रसापूर्णा यमाकारं भावयत्याशु तत्तथा । धत्ते चित्रकृतो बुद्धौ रेखा राम यथा कृतिम् ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

यों सूक्ष्म शरीर कैसे किया जाता है, यह कहकर स्थूलभाव से अपनी इच्छा के अनुसार नानाविध शरीरों की कैसे कल्पना की जाती है, यह बतलाते हैं। हे श्रीरामचन्द्रजी, वही कुण्डलिनी शक्ति (योगी की जीवशक्ति) अग्नि मे पहले उपसंहृत (संचित) जलभाग को जब छोड देती है तव पुनः रस से उस तरह पूर्ण हो जाती है, जिस तरह कूएँ में छोड़ दिया गया मोट (चर्म का पात्र) । इस तरह रस से परिपूर्ण हुई वह कुण्डलिनी पहले उपसंहृत (संचित) पार्थिव भाग को जिस आकार में परिणत करने के लिए भावना करती है, योगशक्ति से वैसा ही आकार बनाकर शीघ्र उसे धारण कर लेती हे