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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 79, Verses 23–31

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 79, verses 23–31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 79 · श्लोक 23-31

संस्कृत श्लोक

यत्किंचिद्यन्न किंचिच्च तज्जानामि यथास्थितम् । यथोदयं यथानाशं तेनास्मि श्रीमती स्थिता ॥ २३ ॥ भोगैरभुक्तैस्तुष्यामि भुक्तैरिव सुदूरगैः । न हृष्यामि न कुप्यामि तेनास्मि श्रीमती स्थिता ॥ २४ ॥ एकैवाकाशसंकाशे केवले हृदये रमे । न रमे राजलीलासु तेनास्मि श्रीमती स्थिता ॥ २५ ॥ आत्मन्येव हि तिष्ठामि ह्यासनोद्यानसद्मसु । न भोगेषु न लज्जासु तेनाहं श्रीमती स्थिता ॥ २६ ॥ जगतां प्रभुरेवास्मि नकिंचिन्मात्ररूपिणी । इत्यात्मन्येव तुष्यामि तेनाहं श्रीमती स्थिता ॥ २७ ॥ इदं चाहमिदं नाहं सत्या चाहं न चाप्यहम् । सर्वमस्मि न किंचिच्च तेनाहं श्रीमती स्थिता ॥ २८ ॥ न सुखं प्रार्थये नार्थं नानर्थं नेतरां स्थितिम् । यथाप्राप्तेन हृष्यामि तेनाहं श्रीमती स्थिता ॥ २९ ॥ तनुविद्वेषराजाभिः प्रज्ञाभिः शास्त्रदृष्टिभिः । रमे सह वयस्याभिस्तेनाहं श्रीमती स्थिता ॥ ३० ॥ पश्यामि यन्नयनरश्मिभिरिन्द्रियैर्वा चित्तेन चेह हि तदङ्ग नकिंचिदेव । पश्यामि तद्विरहितं तु नकिंचिदन्तः पश्यामि सम्यगिति नाथ चिरोदयास्मि ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

“न किंचित्‌ किंचिदाकारं” इस अपनी उक्ति का प्रकारान्तर से वर्णन करती है । सृष्टि का अतिक्रमण न कर जो वस्तु है अर्थात्‌ सृष्टिदृष्टि से दृश्यमान जो किंचित्‌ परिच्छिन्न वस्तु और जो प्रलयदृष्टि से दृश्यमान न किंचिद्रूप वस्तु है उसको कूटस्थभूमानन्दस्वभाव से स्थित मैं जानती हूँ, इसलिए शोभायुक्त होकर मेँ स्थित हूँ। हे प्रिय, भुक्त भोगों के सदृश दूरवर्ती अभुक्त भोगों से भी मैं सन्तुष्ट रहती हूँ। न तो मेँ कुपित होती हूँ और न मैं हृष्ट होती हूँ, इसलिए मैं श्रीसम्पन्न होकर स्थित हूँ। एकमात्र आकाशसदृश विमल अद्वितीय केवल हार्द ब्रह्म में अकेली ही मेँ रमण करती हूँ। राजलीलाओं में रमण नहीं करती, इसलिए मे श्रीमती होकर स्थित हूँ। आसन, उद्यान और घरों में देह के स्थित होनेपर भी मैं पूर्णात्मरूप में ही स्थित रहती हूँ । कभी भी भूषण, सम्मान आदि शारीरिक- मानसिक भोगो में या उनकी अप्राप्ति से जनित लज्जा में स्थित मैं नहीं रहती हूँ” इसी से मैं शोभायुक्त होकर स्थित हूँ। मे समस्त भुवनों की नियामिका हूँ, तुच्छ विषयरूप नहीं हूँ, ऐसा विचार कर मैं अपनी आत्मा में ही सन्तुष्ट रहती हूँ; इसलिए शोभासम्पन्न होकर स्थित हूँ । ये देह आदि अधिष्ठानदृष्टि से (५) मेरे स्वरूप ही हैं और आरोपितदृष्टि से मेरे स्वरूप नहीं है। मैं पारमार्थिक दृष्टि से सत्यस्वरूप हूँ और अपारमार्थिक दृष्टि से मैं नहीं भी हूँ । मैं सर्वस्वरूप हूँ और किंचित्स्वरूप भी नहीं हूँ; इस विचार से मैं श्रीमती बनकर बैठी हूँ। मैं सुख नहीं चाहती, अर्थ नहीं चाहती, अनर्थ का परिहार नहीं चाहती और दूसरी किसी प्रकार की भी स्थिति नहीं चाहती प्रारब्धवश प्राप्त किसी भी अर्थ से सन्तुष्ट रहती हूँ, इसीसे मैं श्रीमती होकर स्थित हूँ । राग और विद्वेष को क्षीण कर देनेवाली आत्मबुद्धि और शास्त्रदृष्टिरूपी सखियों के साथ मैं खेल करती हूँ, इसलिए मैं श्रीमती होकर स्थित हूँ। हे स्वामिन्‌, इस जगत्‌ में नेत्ररश्मियों से, दूसरी इन्द्रियो से या चित्त से जो कुछ भी मैं देखती हूँ वह अनृत रहता ही नहीं यानी वह सब कुछ सत्य ही रहता है। उन इन्द्रियादिदृश्य पदार्थो से भिन्न निष्प्रपंच वस्तु को मैं अपने भीतर देखती हूँ। इस रीति से चूँकि मैं बाहर-भीतर अबाधितवस्तुस्वरूप निरन्तर देखती रहती हूँ, इसलिए हे नाथ, सतत परमअभ्युदयरूप अपूर्वं शोभा से मे शोभित हूँ