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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 79, Verses 21–22

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 79, verses 21–22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 79 · श्लोक 21,22

संस्कृत श्लोक

चूडालोवाच । नाकिंचित्किंचिदाकारमिदं त्यक्त्वाहमागता । नकिंचित्किंचिदाकारं तेनास्मि श्रीमती स्थिता ॥ २१ ॥ इदं सर्वं परित्यज्य सर्वमन्यन्मयाश्रितम् । यत्तत्सत्यमसत्यं च तेनास्मि श्रीमती स्थिता ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार राजा द्वारा पूछी गयी चूडाला परिच्छिन्न देहात्मतात्याग और पूर्ण अद्वितीय ब्रह्मात्मलाभ अपनी अधिक शोभा में हेतु है, यों गूढोक्ति से पहला उत्तर देती है। चूडाला ने कहा : आर्य, मैं इस मूढ़जनों में प्रसिद्ध सम्पूर्ण देहात्मरूपता का परित्याग कर तत्त्वज्ञान से अशेष नामरूपाकारों से निर्मुक्त, परम ब्रह्मभाव को प्राप्त हो गयी हू । मन्त्र, रसायनादि साधनों से तुच्छ तत्तत्‌ सिद्धि को प्राप्त मैं नहीं हूँ, इसलिए मैं दिव्यातिदिव्य श्रीसम्पन्न होकर स्थित हू । इस समस्त परिच्छिन्न वस्तु का परित्याग कर अपरिच्छिन्न अबाधित मूर्त ओर अमूर्त से रहित जो अन्य सब वस्तु है उसका मैंने आश्रय किया हे, इसलिए कान्तिमती होकर मैं अवस्थित हूँ