Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 78, Verses 40–52
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 78, verses 40–52 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 78 · श्लोक 40-52
संस्कृत श्लोक
विचित्रतेव भाण्डानां ननु हेमतया यथा ।
सा तथोदेति तद्रूपमात्मानं चेतति स्वयम् ॥ ४० ॥
स्वचित्तेन द्रवत्वेन तरङ्गादित्वमम्बुषु ।
महाचितौ जगच्चित्तादुदेतीवानुदेत्यपि ॥ ४१ ॥
तदात्मैव यथा यातो रूपवान् जलधौ द्रवात् ।
एवं चिन्मात्रमेवाहमनहंभावमाततम् ॥ ४२ ॥
न तस्य जन्ममरणे न तस्य सदसद्गती ।
न नाशः संभवत्यस्य चिन्मात्रनभसः क्वचित् ॥ ४३ ॥
अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयं चिदादित्योऽतिनिर्मलः ।
आहो नु चिरकालेन शान्तास्मि परिनिर्वृता ॥ ४४ ॥
निर्वामि भ्रमनिर्मुक्तमासे निर्मन्दराब्धिवत् ।
असदाभासमत्यच्छमनन्तमजमच्युतम् ॥ ४५ ॥
आत्माकाशमनाबाधममलं परमं चिरम् ।
अनन्तमिदमाकाशं फलौघाश्चाफलादिकाः ॥ ४६ ॥
सुरासुरयुतं विश्वमेतन्मयमकृत्रिमम् ।
पुंस्त्वकर्ममयी सेना सर्वं मृन्मात्रकं यथा ॥ ४७ ॥
द्रष्टृदृश्यमयी सत्ता चिन्मात्रैक्यमयी तथा ।
इदमैक्यमिदं द्वित्वमहं नाहमितीति च ॥ ४८ ॥
क इव भ्रमसंमोहः कथं कस्य कुतः क्व वा ।
स्वमनन्तमनायासमुपशान्तास्मि संस्थिता ॥ ४९ ॥
निर्वाणपरिनिर्वाणा गतमासे गतज्वरम् ।
अचेतनं चेतन वा योऽयमाभाति चेतति ॥ ५० ॥
भासमानात्म तद्रूपं खं महाचिति संस्थितम् ।
नेदं नाहं न चान्यच्च न भावाभावसंभवः ।
शान्तं सर्वं निरालम्बं केवलं संस्थितं परम् ॥ ५१ ॥
इत्थंविचारणपरा परमप्रबोधाद्बुद्ध्वा यथास्थितमिदं परमात्मतत्त्वम् ।
संशान्तरागभयमोहतमोविलासा शान्ता बभूव शरदम्बरलेखिकेव ॥ ५२ ॥
हिन्दी अर्थ
इसीलिए नाम, रूप, विशेषो का प्रलय होनेपर जगत्-सत्ता मायाशबल ब्रह्मात्मना ही अवस्थित
रह जाती है ओर माया का वाध होनेपर आनन्दैकरसस्वरूप सन्मात्रात्मक आत्मतत्त्वका वह स्वयं अनुभव
करती है, ऐसा कहते है ।
अलंकार आदि की जो विचित्रता है, वह जैसे अलंकारो का विनाश हो जानेपर सुवर्णसत्तात्मना ही
उदित होती है, वैसे ही जगत् का विलय हो जानेपर जगत् की सत्ता मायाशबल ब्रह्यात्मरूप से उदित
होती है ओर माया का बाध हो जानेपर सच्चिदानन्दरूप आत्मसत्ता का स्वयं अनुभव करती हे । जैसे
स्वप्न तथा इन्द्रजाल आदि में द्रवरूप से परिणत अपने चित्त से सिद्ध समुद्र के जल में तरंग आदि
वास्तव में अनुदित भी उदित होते हैं, वैसे ही महाचिति में वास्तव में अनुदित भी जगत् आदि समष्टिचित्त
के कारण उदित होते हैँ । जैसे स्वप्न में चिद्रूप आत्मा ही जलधि में द्रव के कारण चित्तकल्पित जलरूप
से तरंग आदि रूपवान् पदार्थ होता है, आत्मा से अतिरिक्त वहाँ कुछ नहीं रहता, वैसे ही चिन्मात्र ही मैं
जगद्रूप से सम्पन्न हूँ, परमार्थतः पूर्णचिदात्मक मुझ से अतिरिक्त अणुमात्र भी नहीं है, इस प्रकार
अहंभाव का भी परिशेष न रहने से अनहंभाव चिन्मात्र ही विस्तीर्ण हे । इस चिन्मात्रस्वरूप आकाश के
जन्म, मरण, सद्गति, असद्गति (स्वर्ग-नरक) या नाश का कहीं सम्भव ही नहीं हे । यह आत्मा छेदन
के योग्य नहीं है, दाह के योग्य नहीं हे, यह चितिरूपी आदित्य अतिनिर्मल है । अहा, मेँ दीर्घकाल के बाद
शान्त होकर चारों ओर से परम सुखी हुई हूँ । अब मैं सर्वविध भ्रमो से निर्मुक्त होकर विचरण कर रही हूँ,
मन्दराचल से शून्य प्रशान्त सागर के सदृश अवस्थित हूं । ब्रह्मा से लकर स्तम्बपर्यन्त जितने भी
प्राणियों के कर्मफल हैं, जितने भी उनके साधनभूत व्यापार हैं एवं जो भी निष्फल वृथा चेष्टाएँ हैं, वे सब
उस अनन्त आकाशस्वरूप चैतन्यात्मा के स्वरूप हैं; जो दृश्याभास से शून्य, अत्यन्त स्वच्छ, अनन्त,
अज, अच्युत, कालपरिच्छेद से शून्य, देश और वस्तुकृत परिच्छेद से शून्य, आकाशरूप, निर्मल,
बाधरहित और परम है। कुलाल आदि पुरुष जाति से बनाई गयी मृत्तिका की सेना जैसे मृत्तिकारूप ही
है, वैसे ही सुर, असुर आदि से युक्त यह विश्व अकृत्रिम परब्रह्मस्वरूप ही है। उसी प्रकार द्रष्टा एवं
दृश्यरूप सत्ता भी एकमात्र चैतन्यरूप ही हे । यह ऐक्य है, यह द्वैत है, यह मैं हूँ, यह मैं नहीं हूँ, इत्यादि
भ्रमजनित मोह कौन चीज है; वह किस तरह हुआ, किसको हुआ और कहाँ से आया ? अर्थात् यह सब
मिथ्या ही है। अपने अन्दर अनन्त पारमार्थिक स्वरूप की अनायास प्राप्तिकर अब शान्त होकर अवस्थित
हूँ। अब मैं मोक्षसुख में अच्छी तरह विश्रान्त हूँ, संसाररूप ज्वर से वर्जित भूले हुए हार की प्राप्ति के
सदृश प्राप्त हुए स्वरूप में अब बैठ गयी हूँ अचेतन या चेतन जो भी कुछ जगत् प्रकाशित होता है
अथवा जो भी कुछ उसके भोक्तारूप से प्रकाशित हो रहा है वे दोनों भासमान आत्मा से अभिन्न जो
ब्रह्म है, तद्रूप आकाशस्वरूप ही हैं। न तो इदं है, न अहं है और न दूसरा है एवं न तो भाव और अभाव
का संभव है। सब कुछ शान्त, निरालम्ब केवल परब्रह्मरूप ही होकर स्थित है। इस प्रकार आत्मा के
विचार में परायण वह चूडाला मोहरूपी निद्रा का आत्यन्तिक विनाश हो जाने के कारण यथास्थित इस
परम आत्मतत्त्व का भलीभाँति परिज्ञानकर राग, भय, मोह आदि अज्ञानविलासों के शान्त होने से उस
प्रकार शान्त हो गयी, जिस प्रकार शरत्-कालीन आकाश की लेखा