Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 79, Verses 1–5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 79, verses 1–5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 79 · श्लोक 1-5
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
दिनानुदिनमित्येषा स्वात्मारामतया तया ।
नित्यमन्तर्मुखतया बभूव प्रकृतिस्थिता ॥ १ ॥
नीरागा निरुपासङ्गा निर्द्वन्द्वा निःसमीहिता ।
न जहाति न चादत्ते प्रकृताचारचारिणी ॥ २ ॥
परितीर्णभवाम्भोधिः शान्तसंदेहजालिका ।
परमात्ममहालाभपरिपूर्णान्तरात्मना ॥ ३ ॥
विश्रान्ता सुचिरं श्रान्ता घनलब्धपदान्तरे ।
सर्वोपमातीततया जगामाव्यपदेश्यताम् ॥ ४ ॥
इति सा भामिनी तस्य चूडाला वरवर्णिनी ।
स्वल्पेनैव हि कालेन ययौ विदितवेद्यताम् ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार विचार से उत्पन्न तत्त्वज्ञान की - अभ्यास द्वारा उत्तरोत्तर भूमिकाओं में - प्रतिष्ठा हुई,
यह कहते हैं।
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, उस प्रकार की यह चूडाला दिनक्रम से अभ्यास द्वारा अपने
स्वाभाविक स्वरूप में अवस्थित हो गयी, क्योंकि वह निरन्तर अन्तर्मुखवृत्ति से युक्त और प्रसिद्ध
आत्माराम से सम्पन्न थी । उसके रागादि दोष निकल गये थे उसका समीपस्थ किन्हीं पदार्थों से
संग नहीं था । सुखदुःख आदि द्वन्द्व से वह निर्मुक्त हो चुकी थी, वह स्वर्गादि की इच्छाओं से ओर
तदनुकुल चेष्टाओं से विरत हो चुकी थी, वह न किसी पदार्थ का ग्रहण करती थी ओर न किसीका
परित्याग करती थी । केवल समयानुसार प्राप्त आचारमात्र को निभाती थी । संसाररूपी महासमुद्र
को वह तैर गयी थी, सन्देहरूपी जाल उसके कट गये थे । उसका प्रत्यगात्मा परमात्मा के महान् लाभ
से परिपूर्ण हो गया था। दीर्घकाल से संसार में भ्रमण करने से श्रान्त हुई वह चूडाला ज्ञानलब्ध
आनन्दघन परमपद में अब विश्राम कर रही थी । संसार की सभी उपमाओं से परे हो जाने के कारण
वह अव्यपदेश्य हो गयी थी । इस प्रकार सुन्दरवर्णवाली उस शिखिध्वज की उत्तम पत्नी वह चूडाला
स्वल्पकाल में ही विदितवेद्य बन गयी
सर्ग सन्दर्भ
अठहत्तरवाँ सर्ग समाप्त उननासीवाँ सर्ग अपूर्वशोभासम्पन्न देखकर राजा शिखिध्वज से पूछी गईं चूडाला द्वारा अपनी शोभा में हेतु आत्मज्ञान का वर्णन ।