Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 78, Verses 31–38
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 78, verses 31–38 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 78 · श्लोक 31-38
संस्कृत श्लोक
यद्वै विज्ञेयतां कृत्वा न कश्चिद्धीयते पुनः ।
एते हि चिद्विलासान्ता मनोबुद्धीन्द्रियादयः ॥ ३१ ॥
असन्तः सर्व एवाहो द्वितीयेन्दुपदस्थिताः ।
महाचिदेकैवास्तीह महासत्तेति योच्यते ॥ ३२ ॥
निष्कलङ्का समा शुद्धा निरहंकाररूपिणी ।
शुद्धसंवेदनाकारा शिवं सन्मात्रमच्युतम् ॥ ३३ ॥
सकृद्विभाता विमला नित्योदयवती सदा ।
सा ब्रह्मपरमात्मादिनामभिः परिगीयते ॥ ३४ ॥
चेत्यचेतनचित्तादि नास्या भिन्नं न मानतः ।
तयैषा चैत्यते चिच्छ्रीः सैषाद्या चिदिति स्मृता ॥ ३५ ॥
अचेत्यं यदिदं चित्त्वं तत्तस्या रूपमक्षतम् ।
मनोबुद्धीन्द्रियाद्यर्थरूपैः सैव विजृम्भते ॥ ३६ ॥
तरङ्गकणकल्लोलकलनेयं चिदात्मनि ।
जगद्रूपपदार्थानां सत्ता स्फुरति मातरि ॥ ३७ ॥
यदिदं तत्परं रूपं तस्याः खलु महाचितेः ।
शुद्धचिन्मणिवत्सा हि सेयं समसमोदिता ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
अहो, ये जितने मन, बुद्धि, इन्द्रिय आदि पदार्थ हैं, वे सबके सब चिद्विलास को परिच्छिन्न बना देने
में केवल कारणरूप ही हैं, वे स्वयं असत्स्वरूप ही हैं और उनका स्थान नेत्रपर अंगुली रखने पर दिखाई
दे रहे द्वितीय चन्द्रमा का ही है अर्थात् वे भ्रान्तिमात्र से परिकल्पित हैँ । वास्तव में सर्वविध आवरणादि से
निर्मुक्त अकेली महाचिति ही इस संसार में सब काल में अपना अस्तित्व रखती हे । जिसको महासत्ता
भी कहते हँ । यह कलंकों से शून्य, समानरूप, विशुद्ध ओर अहंकारवर्जित स्वरूपवाली है उसका
स्वरूप शुद्ध विज्ञान ही है, भूमानन्दरूप होने से वह परम मंगलात्मक सन्मात्ररूप हे । भूमानन्दरूप
स्वभाव से वह कभी भी च्युत नहीं होती । मूलअविद्यारूप आवरण के भंग से एक बार उसका यदि
साक्षात्कार हो जाय, तो वह फिर कदापि आवृत्त नहीं होती । इसलिए वह वेदान्त आदि अध्यात्मशास्त्रों
में लक्षणावृत्ति से नित्य उदयवती कही जाती है । उसीका ब्रह्म, परमात्मा आदि नामों से सर्वत्र गान किया
जाता हे । चेत्य (ज्ञेय) आदि त्रिपुटीसमूह इससे भिन्न कोई दूसरी वस्तु ही नहीं हे, क्योकि यह त्रिपुटी
साक्षीरूप उसीसे प्रकाशित होती है । यह साक्षीस्वरूप चिति किसी दूसरे प्रमाण से सिद्ध नहीं होती,
क्योकि त्रिपुटी प्रवृत्ति के पहले ही वह स्वयंसिद्ध हे, अतः वह आद्या चिति कही गयी है । चेत्यशून्य जो
यह चिद्रूपता है, वह उसका अविनाशी रूप है । मन, बुद्धि, इन्द्रिय आदि पदार्थो के स्वरूपो से वह चिति
ही विवर्तित होती हे । मन, बुद्धि आदि विवर्तो से चैतन्यात्मा जब प्रमातृरूपता प्राप्त करता है, तब उसमें
तरंगकणों के कल्लोलों के सदृश यह जगद्रूप भूत-भोतिक पदार्थो की अस्तिता स्फुरित होती है । जो यह
जगत्सत्ता का रूप प्रसिद्ध हे, वही अधिष्ठानभूत महाचिति का दूसरा स्वरूप है, क्योकि वह सत्तारूप
चिति स्फटिकमणि के सदृश जगत् का प्रतिबिम्ब असंग होकर ही धारण करती है, और यह जगत्सत्ता
तो व्यावहारिक तथा प्रातिभासिक पदार्थों में अपने-अपने अधिष्ठान के अनुसार उदित है